Wednesday, May 16, 2018

RAJA MHENDRA PRATAP .. इतिहास मिटाने से नहीं मिटते !.....PREMA RAM SIYAG


इतिहास मिटाने से नहीं मिटते !
इतिहास कलम से भी नहीं बनते!!
इतिहास बनाने के लिए शौर्य,पराक्रम,त्याग व तपस्या की जरूरत होती है और धुंधला करने के लिए लंबी लकीर खींचने की जरूरत होती है।25दिसंबर 2015को यह खबर तो मीडिया में खूब आई कि मोदीजी नवाज शरीफ से मिलने उनके घर पहुंचे लेकिन यह बात छुपाने की कोशिश की गई कि काबुल की संसद में न चाहते हुए भी मोदीजी की जुबान से किसने सच्चा इतिहास उगलवा डाला था।नाम भले ही अटल ब्लॉक रखा हो लेकिन मुंह तो ब्लॉक एक जाट राजा ने ही रखा था।

एक तरफ मुगल युग का पराभव हो रहा था तो दुसरी तरफ छोटे-छोटे राज्यों का उद्भव हो रहा था।उत्तरप्रदेश में अवध व मुरसान राज्यों का उदय हुआ।मुरसान में राजा घनश्यामसिंह एक ताकत के रूप में उभरे व औरंगज़ेब की मृत्यु के उपरान्त सन 1716 में मुरसान का किला बनवाया गया था। औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद 'मुरसान' एक राज्य के रूप में पूरी तरह अस्तित्व में आ गया।राजा घनश्याम सिंह के तीन पुत्र थे।तीसरे पुत्र का नाम खड़गसिंह था।
पडौसी हाथरस राज्य के राजा हरिनारायण सिंह के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने मुरसान राजा घनश्याम सिंह के पुत्र खड़गसिंह को तीन साल की उम्र में गोद ले लिया था लेकिन 8साल की उम्र तक मुरसान राजा ने अपने पुत्र को इस डर से हाथरस नहीं भेजा कि कहीं धन-संपदा के लालच में बच्चे के साथ कोई अनिष्ट न कर दें।खड़गसिंह का जन्म 1 दिसम्बर 1886 को हुआ।सन 1894 में जब वो हाथरस पहुंचे तो उनका नाम रखा गया राजा महेंद्र प्रताप सिंह।शुरुआती शिक्षा अलीगढ़ के गवर्नमेंट स्कूल में प्राप्त की व बाद में महेंद्र प्रताप को पिता घनश्याम सिंह के दोस्त सर सैयद खाँ के निवेदन पर अलीगढ़ एम ए ओ कॉलेज में दाखिल करवा दिया।यहां महेंद्र प्रताप ने बी ए तक शिक्षा हासिल की।बाद में राजा बहादुर घनश्याम सिंह ने इस कॉलेज को साढ़े तीन एकड़ जमीन दान में दी । आगे चलकर खुद महेन्द्रप्रताप ने एल्युमनी के नाते ओर जमीन दान में दी व यह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बन गया।
1904 में जिंद रियासत के राजा की राजकुमारी से संगरूर में विवाह हुआ।एक जाट के घर पैदा हुए,मुस्लिम संस्थान में शिक्षा अर्जित की व सिक्ख घराने में शादी हुई।राजा महेंद्र प्रताप जवानी की दहलीज तक आते-आते धार्मिक संकीर्णता की सोच से ऊपर उठ चुके थे।1906 में राजा साहब कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे।जींद रियासत के राजा व उनके ससुर ने उनको कांग्रेस में जाने से परहेज करने के लिए कहा था।
राजा महेंद्र प्रताप के दादा अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे।वो बात उनके दिमाग मे घर कर गई थी कि अंग्रेज मुझे कितनी ही सहूलियतें दें लेकिन उनका राज प्रजा हितेषी नहीं है।इसलिए राजा महेंद्र प्रताप ने अंग्रेजों से किसी भी प्रकार की सहूलियतें लेने से साफ मना कर दिया था।उनके दिल मे देश की गरीब जनता का दर्द हमेशा झलकता था।वो जनता के लिए कुछ करना चाहते थे और इसकी शुरुआत की शिक्षा के क्षेत्र में।1909 में वृन्दावन में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना की जो तकनीकी शिक्षा के लिए भारत में प्रथम केन्द्र था। मदनमोहन मालवीय इसके उद्धाटन समारोह में उपस्थित रहे। ट्रस्ट का निर्माण हुआ-अपने पांच गाँव, वृन्दावन का राजमहल और चल संपत्ति का दान दिया।
राजा महेंद्र प्रताप उदार व विशाल दृष्टि के थे।वे जाति, वर्ग, रंग, धर्म ,देश आदि के द्वारा मानवता को विभक्त करना घोर अन्याय, पाप और अत्याचार मानते थे। ब्राह्मण-भंगी को भेद बुद्धि से देखने के पक्ष में नहीं थे। वृन्दावन में ही एक विशाल फलवाले उद्यान को जो 80 एकड़ में था, 1911 में आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश को दान में दे दिया। जिसमें आर्य समाज गुरुकुल है और राष्ट्रीय विश्वविद्यालय भी है।
एक बार तो छुआछूत के खिलाफ लोगों को साथ लाने के लिए उन्होंने अलमोड़ा में वहां की नीची जाति के परिवार के घर में खाना खाया, तो आगरा में भी एक दलित परिवार के साथ खाना खाया।19वीं सदी के पहले दशक में एक जाट और राजा के परिवार में कोई ऐसा सोचने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था। फिर विदेशी वस्त्रों के खिलाफ अपनी रियासत में उन्होंने जबरदस्त अभियान चलाया। बाद में उनको लगा कि देश में रहकर कुछ नहीं हो सकता।
'निर्बल सेवक' समाचार-पत्र देहरादून से राजा साहेब निकालते थे। उसमें जर्मन के पक्ष में लिखे लेख के कारण उन पर 500 रुपये का दण्ड किया गया जिसे उन्होंने भर तो दिया लेकिन देश को आजाद कराने की उनकी इच्छा प्रबलतम हो गई।द्वितीय विश्वयुद्ध का फायदा उठाकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ने की तैयारी करने के बारे में सोचा।विदेश जाने के लिए पासपोर्ट नहीं मिला। मैसर्स थौमस कुक एण्ड संस के मालिक बिना पासपोर्ट के अपनी कम्पनी के पी. एण्ड ओ स्टीमर द्वारा इंगलैण्ड राजा महेन्द्र प्रताप को ले गया। उसके बाद राजा ने जर्मनी के शासक कैसर से भेंट की। उन्हें आजादी में हर संभव सहायता देने का वचन दिया। जर्मन राजा से काफी भरोसा पाकर वो बर्लिन से चले आए। बर्लिन छोड़ने से पहले उन्होंने पोलैंड बॉर्डर पर सेना के कैंप में रहकर युद्ध की ट्रेनिंग भी ली। उसके बाद वो स्विट्जरलैंड, तुर्की, इजिप्ट में वहां के शासकों से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सपोर्ट मांगने गए।वहाँ से बुडापेस्ट, बल्गारिया, टर्की होकर हैरात पहुँचे। अफगान के बादशाह से मुलाकात की।एक दिसंबर 1915 का दिन था, राजा महेंद्र प्रताप का जन्मदिन, उस दिन वो 28 साल के हुए थे। उन्होंने भारत से बाहर देश की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया, बाद में सुभाष चंद्र बोस ने 28 साल बाद उन्हीं की तरह आजाद हिंद सरकार का गठन सिंगापुर में किया था। राजा महेंद्र प्रताप को उस सरकार का राष्ट्रपति बनाया गया यानी राज्य प्रमुख। मौलवी बरकतुल्लाह को राजा का प्रधानमंत्री घोषित किया गया और अबैदुल्लाह सिंधी को गृहमंत्री।
दिलचस्प बात ये थी कि जिस साल में राजा ने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई, उसी साल गांधी जी साउथ अफ्रीका से भारत वापस लौटे थे और प्रथम विश्व युद्ध के लिए भारतीयों को ब्रिटिश सेना में भर्ती करवा रहे थे, उन्हें भर्ती करने वाला सर्जेंट तक कहा गया था।
अफगानिस्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया तभी वे रूस गये और लेनिन से मिले। परंतु लेनिन ने कोई सहायता नहीं की।राजा के सिर पर ब्रिटिश सरकार ने इनाम रख दिया, रियासत अपने कब्जे में ले ली, और राजा को भगोड़ा घोषित कर दिया। राजा ने काफी परेशानी के दिन झेले। फिर उन्होंने जापान में जाकर एक मैगजीन शुरू की, जिसका नाम था वर्ल्ड फेडरेशन। लंबे समय तक इस मैगजीन के जरिए ब्रिटिश सरकार की क्रूरता को वो दुनिया भर के सामने लाते रहे। फिर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राजा ने फिर एक एक्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया, ताकि ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने के लिए मजूबर किया जा सके। लेकिन युद्ध खत्म होते-होते सरकार राजा की तरफ नरम हो गई थी, फिर आजादी होना भी तय मानी जाने लगी। राजा को भारत आने की इजाजत मिली। ठीक 32 साल बाद राजा भारत आए, 1946 में राजा मद्रास के समुद्र तट पर उतरे।1920 से 1946 विदेशों में भ्रमण करते रहे।राजा महेंद्र प्रताप ने विश्व मैत्री संघ की स्थापना की। 1946 में जब वो भारत लौटे तो सरदार पटेल की बेटी मणिबेन उनको लेने कलकत्ता हवाई अड्डे गईं।वहीं से सीधे वो गांधीजी से मिलने वर्धा पहुंचे।
राजा का नाम शिक्षा के क्षेत्र में योगदान,सर्वधर्म समभाव,भाईचारे व प्रेम,गरीबों के उत्थान व सामाजिक न्याय के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया था लेकिन उस साल विश्वयुद्ध के बीच नोबेल कमेटी ने पुरस्कार बांटना कैंसिल कर दिया और फंड चैरिटी में दान कर दिया था।लेकिन जो नाम पुरस्कार के लिए चुने जाते थे उस पर कमेटी अपना कमेंट सार्वजनिक करती है।कमेटी ने राजा महेन्द्रप्रताप के लिए लिखा "Pratap gave up his property for educational purposes, and he established a technical college at Brindaban. In 1913 he took part in Gandhi's campaign in South Africa. He travelled around the world to create awareness about the situation in Afghanistan and India. In 1925 he went on a mission to Tibet and met the Dalai Lama. He was primarily on an unofficial economic mission on behalf of Afghanistan, but he also wanted to expose the British brutalities in India. He called himself the servant of the powerless and weak."।
1952 में मथुरा से निर्दलीय सांसद बने और 1957 में फिर से अटल बिहारी वाजपेयी को हराकर निर्दलीय ही सांसद चुने गए। बिना किसी का अहसान लिए शान से राजा की तरह जीते रहे।राजा साहब हमेशा धर्मों के बीच की नूराकुश्ती से नफरत करते थे।जाटघराने में वो पैदा हुए थे, मुस्लिम संस्था में पढ़े थे,यूरोप में तमाम ईसाइयों से उनके गहरे रिश्ते थे, सिख परिवार में उनकी शादी हुई थी। वो मानव धर्म को ही सबसे बड़ा धर्म मानते थे।राजा साहब चाहते थे कि मानवीयता को, प्रेम को बढ़ावा मिलना चाहिए। राजा महेंद्र प्रताप ने तब वो कर डाला जो कभी मुगल बादशाह अकबर ने किया था, जैसे अकबर ने नया धर्म दीन ए इलाही चलाया था, वैसे भी राजा महेंद्र प्रताप ने भी एक नया धर्म शुरू कर दिया, प्रेम धर्म। इस धर्म के अनुयायियों का एक ही उद्देश्य था प्रेम से रहना, प्रेम बांटना और प्रेम भाईचारे का संदेश देना। हालांकि दीन ए इलाही की तरह प्रेम धर्म भी उसको चलाने वाले के साथ ही गुमनामी में खो गया। 29 अप्रैल 1979 में उनका निधन हो गया।
उनकी मौत के बाद सरकार ने एक डाक टिकट जरूर जारी किया। उनके कामों और योगदान को देखते हुए न सरकारों ने व न इतिहासकारों ने इंसाफ किया। दुनिया भले ही नोबेल के लायक उनको मान ले, लेकिन सरकार उनकी जयंती तक मनाने लायक नहीं समझती।
25दिसंबर 2015को प्रधानमंत्री मोदी रूस से सीधे काबुल पहुंचते है और नवनिर्मित संसद के एक ब्लॉक का उद्घाटन करते हुए कहते है “Indians remember the support of Afghans for our freedom struggle; the contribution of Khan Abdul Gaffar Khan, revered as Frontier Gandhi; and, the important footnote of that history, when, exactly hundred years ago, the first Indian Government-in-Exile was formed in Kabul by Maharaja Mahendra Pratap and Maulana Barkatullah.King Amanullah once told the Maharaja that so long as India was not free, Afghanistan was not free in the right sense. Honourable Members, This is the spirit of brotherhood between us”।
यह भारत की सरकारों का दोगलापन रहा है कि मजबूरी में प्रशंसा तो कर देते है लेकिन संसद भवन के ब्लॉक का नामकरण हवाई जहाज में बैठाकर आतंकियों को कंधार पहुंचाने वालों के नाम कर देते है।
राजा महेंद्र प्रताप न पूर्ण वामपंथी थे न दक्षिणपंथी।वो सिर्फ और सिर्फ मानवपंथी थे।उनके लिए धर्म व जाति से परे हर मानव बराबर था।वो न तो आरएसएस व हिन्दू महासभा के समर्थक और न कांग्रेस के।इसीलिए आजादी के समय विदेशमंत्री के लिए सबसे योग्य व्यक्ति होने के बावजूद नेहरू ने उनको दरकिनार कर दिया और बीजेपी के पहले प्रधानमंत्री को 1957के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी बनकर शिकस्त दी थी।न कांग्रेस के इतिहासकारों ने राजा साहब के इतिहास को सम्मान दिया न बीजेपी के इतिहासकारों ने इंसाफ करने की कोशिश करी।
आज राजा साहब का इतिहास जिंदा है तो चुनिंदा जागरूक जाटों के पास जिंदा है।आमतौर पर हाथरस जिले का भारत के नक्शे पर कोई बहुत महत्वपूर्ण स्थान नहीं बन पाया।आम आदमी उसे काका हाथरसी की नगरी के तौर पर जानता है या हींग, घी, रंग, रबड़ी जैसे कुछ उम्दा प्रोडक्ट्स केंद्र के तौर पर।
आज जरूरत है कि हाथरस जिले का बच्चा-बच्चा जाने कि वो किस महान राजा की नगरी में निवास करते है!विशेष तौर से हम जाट युवाओं को अपने गौरवशाली इतिहास को घर घर पहुंचाने का बीड़ा उठाना चाहिए।गांधी-गोवलकर का मिथिहास हमारे इतिहास के सामने कुछ नहीं है।ऐसे हमारे महान पुरख के त्याग व बलिदान से सिर्फ हमे प्रेरणा ही नहीं लेनी है बल्कि हर युवा को प्रेरित भी करना है।आइए मिलकर हम अपने गौरवशाली इतिहास के बल पर स्वर्णिम भविष्य के निर्माण की तरफ कदम बढ़ाए।
प्रेमाराम सियाग

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