Monday, May 14, 2018

jyani (ज्याणी) ज्याणी गौत्र का इतिहास

jyani (ज्याणी)[1] Jiani (जियाणी) Jani (जाणी) Jani (जानी)[2] Gotra Jats are found in Rajasthan,[3] HaryanaPunjab and Madhya Pradesh. Jani clan is found in Afghanistan.[4] Jani (जानी) Jat clan is found in Amritsar.[5] They supported the ascendant clan Johiya and became part of a political confederacy:[6]They had joined Parihar Confederation.ज्यानी  [1] जियानी (जियानी) जानी (जाणी) जानी (जानी) [2] गोत्र जाट राजस्थान में पाए जाते हैं, [3] हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश। अफगानिस्तान में जाणी कबीले पाए जाते हैं। [4] ज्यााणी(जाणी) जाट कबीले अमृतसर में पाई जाती है। [5] उन्होंने बढ़िया कबीले जोहिया का समर्थन किया और राजनीतिक संघटन का हिस्सा बन गया: [6] वे पारिहार संघ में शामिल हो गए थे।

Bhim Singh Dahiya writes that Jāli are mentioned by Panini under the name of Jālamani along with Jānaki, to be identified with the Jani clan in the Trigarta people. [7]
According to H.A. Rose[8] Jat clans derived from Joiya are: PasalMondhlaKhicharJaniMachraKachroyaSor and Joiya.
भीम सिंह दहिया लिखते हैं कि जनाकी के साथ जमालानी के नाम पर पाणिनी द्वारा जाली का उल्लेख त्रिगर्ता लोगों में जाणी कबीले का उल्लेख किया जाना है। [7]

एचए रोज के मुताबिक  [8] जोया से निकले जाट कुल हैं: पासल, मोंडला, खीचर, जाणी, माचरा, कचरोय, सोर और जोया।

ज्याणी गौत्र का इतिहास

ईसराण गौत्र का यह इतिहास प्रो. हनुमानाराम ईसराण (Mob: 9414527293, Email:<hrisran@gmail.com>) द्वारा उपलब्ध कराया गया है। ये तथ्य बही भाट श्री कानसिंह गांव ढेंचवास, पोस्ट:चौसाला वाया डिग्गी, तहसील: मालपुरा, जिला:टोंक (राजस्थान) की बही में अभिलिखित है।
ज्याणी का गौत्रचारा
ज्याणी गोत्र की वंशावली:
ज्याणी गोत्र के प्रथम महापुरुष/संत पुरूष श्री महिदास जी हुए।
महिदास जी के 65 पीढ़ी उपरांत श्री पुरूषोतम नामक सिद्ध पुरुष हुए।
श्री पुरूषोत्तम जी के चार पुत्र हुए जिनसे निम्नानुसार जाट चार गोत्र प्रसिद्ध हुये :-
1. ज्ञानाराय ----ज्याणी
2. जोरराज----झूरिया
3. हेमराज----हुड्डा
4. ईसरराय---ईसराण

कटराथल के चौधरी

कटराथल के संबंध में रणमल सिंह[9] ने लिखा है कि.... मेरे डोरवाल पूर्वज संवत 1807 तदनुसार 1759 ई में ग्राम बारवा, जिला झुंझूनुं से कटराथल आए थे। कारण एक दुर्घटना घटित हो गई थी। कहते हैं कि छपनिया अकाल से पूर्व खेजड़ी छांगते नहीं थे । भेड़ बकरियों को ही कुल्हाड़ा या अकूड़ा से काटकर चारा डाल दिया करते थे। उस समय गाय ही प्रमुख पशुधन था। ऊंट व भैंस नाम के ही थे। उस समय कहावत थी कि “घोड़ां राज और बल्दां (बैल) खेती” पाला (बेर की झड़ी की पत्तियाँ) बहुत होता था , सो गायों को पाला डाल देते और कड़बी का पूला तोड़ देते। उस समय छानी नहीं काटी जाती थी। मेरे पूर्वजों के खेत में चार राजपूतों के लड़के आए और उन्होने खेजड़ी की टहनियाँ काटकर अपनी बकरियों को डाल दी। हमारे पूर्वज के चार बेटे थे। सबसे छोटा बेटा बकरियाँ लेकर खेत गया हुआ था। उसने उनका विरोध किया औए अकेला ही उन चारों से भीड़ लिया। एक लड़के ने उसकी गरदन पर कुल्हाड़े से वार कर दिया और उसकी वहीं मृत्यु हो गई। इसका समाचार जब उसके पिता को दिया तो वह लट्ठ लेकर चल पड़ा। उन चारों में से एक लड़का तो भाग गया शेष तीन को उसने जान से ही मार डाला। गाँव के राजपूतों ने मंत्रणा की कि ये चारों बाप-बेटे हम से तो मार खाएँगे नहीं , क्योंकि सभी 6 फीट के जवान थे। अन्य गांवों और आस-पास के राजपूतों को बुलाकर लाओ और रात को इनके घर को आग लगाकर इन्हें जीवित जलादो। यह सूचना एक दारोगा (रावणा राजपूत) ने इनको दे दी। सो अपना गाड़ा (चार बैलों वाला) और दो बैलों में बर्तन भांडे, औरतें तथा बकरियों के छोटे बच्चों तथा गायों के छोटे बछड़ों को गाड़े में बैठाकर यहाँ से चल पड़े और रात को बेरी ग्राम के बीड़ में आकर रुके। सुबह उठकर कटराथल पहुँच गए। उस समय कटराथल में चौधरी (मेहता) ज्याणी गोत्र का जाट था। हमारे गाँव में मुसलमानों ने बौद्धकालीन मंदिर तोड़कर टीले पर गढ़ बनाया था। उस की एक बुर्ज आज भी खड़ी है। बौद्धकालीन मूर्तियों को गढ़ की नींव में औंधे मुंह डाल दिया। कालांतर में शेखावतों ने गढ़ पर कब्जा कर लिया था। हमारे गाँव के दो राजपूत जयपुर-भरतपुर के बीच हुये युद्ध (मावण्डा) में मारे गए थे। उनकी छतरियाँ आज भी गाँव मैं मौजूद हैं। दो विधवा ठुकराणियां एवं उनके नौकर-चाकर ही थे।

[पृष्ठ-112]: ज्याणी गोत्र के जाट चौधरी ने उन ठुकराणियों को बताया कि एक आदमी अपने परिवार एवं पशुओं सहित आया है तो उन्होने कहा कि उसे यहीं बसाओ। खीचड़ गोत्र के जाट हमारे पूर्वजों से 50 वर्ष पहले ही कटराथल में आकर बसे थे। उनके पास ही हमारे पूर्वजों को बसा दिया गया।

तेजाजी से संबंध

तेजाजी के ननिहाल दो जगह थे – त्योद (किशनगढ़, अजमेर) और अठ्यासन (नागौर)।
तेजाजी के पिता ताहड़देव जी धौलिया का पहला विवाह त्योद किशनगढ़ के दुल्हण जी सोढ़ी – ज्याणी जाट की पुत्री रामकुंवरी के साथ वि.स. 1106 (=1049 AD) में सम्पन्न हुआ। विवाह के 12 वर्ष पश्चात भी जब खरनाल गणराज्य के उत्तराधिकारी के रूप में किसी राजकुमार का जन्म नहीं हुआ तो राजमाता रामकुँवरी ने ताहड़ जी को दूसरे विवाह की अनुमति दी और स्वयं अपने पीहर त्योद जाकर शिव और नागदेवता की पूजा अर्चना में रत हो गई।
तेजाजी के प्रथम ननिहाल त्योद में ज्याणी जाटों के मात्र 3 घर ही हैं। इनके पूर्वज मंगरी गाँव में बस गए हैं।
संदर्भ – विश्वेन्द्र चौधरी ‘वीर तेजाजी विशेषांक’ (M:9983202007), लेखक: बलबीर घींटाला (M: 9024980515) , शोधकर्ता व लेखक – संत कान्हाराम सुरसुरा (M:9460360907)

तेजाजी का इतिहास

संत श्री कान्हाराम[10] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-84]: तेजाजी के जन्म के समय (1074 ई.) यहाँ मरुधरा में छोटे-छोटे गणराज्य आबाद थे। तेजाजी के पिता ताहड़ देव (थिरराज) खरनाल गणराज्य के गणपति थे। इसमें 24 गांवों का समूह था। तेजाजी का ससुराल पनेर भी एक गणराज्य था जिस पर झाँझर गोत्र के जाट राव रायमल मुहता का शासन था। मेहता या मुहता उनकी पदवी थी। उस समय पनेर काफी बड़ा नगर था, जो शहर पनेर नाम से विख्यात था। छोटे छोटे गणराज्यों के संघ ही प्रतिहार व चौहान के दल थे जो उस समय के पराक्रमी राजा के नेतृत्व में ये दल बने थे।

[पृष्ठ-85]: पनैरजाजोता व रूपनगर गांवों के बीच की भूमि में दबे शहर पनेर के अवशेष आज भी खुदाई में मिलते हैं। आस पास ही कहीं महाभारत कालीन बहबलपुर भी था। पनेर से डेढ़ किमी दूर दक्षिण पूर्व दिशा में रंगबाड़ी में लाछा गुजरी अपने पति परिवार के साथ रहती थी। लाछा के पास बड़ी संख्या में गौ धन था। समाज में लाछा की बड़ी मान्यता थी। लाछा का पति नंदू गुजर एक सीधा साधा इंसान था।
तेजाजी की सास बोदल दे पेमल का अन्यत्र पुनःविवाह करना चाहती थी, उसमें लाछा बड़ी रोड़ा थी। सतवंती पेमल अपनी माता को इस कुकर्त्य के लिए साफ मना कर चुकी थी।
खरनाल व शहर पनेर गणराजयों की तरह अन्य वंशों के अलग-अलग गणराज्य थे। तेजाजी का ननिहाल त्योद भी एक गणराज्य था। जिसके गणपति तेजाजी के नानाजी दूल्हण सोढ़ी (ज्याणी) प्रतिष्ठित थे। ये सोढ़ीपहले पांचाल प्रदेश अंतर्गत अधिपति थे। ऐतिहासिक कारणों से ये जांगल प्रदेश के त्योद में आ बसे। सोढ़ी से ही ज्याणी गोत्र निकला है।


संत श्री कान्हाराम[11] ने लिखा है कि....ताहड़ देव की प्रथम पत्नी त्योद निवासी ज्याणी गोत्र के जाट करसण जी के पुत्र राव दूल्हन जी सोढ़ी की पुत्री थी। यह सोढ़ी शब्द दूल्हन जी की खाँप या उपगोत्र अथवा नख से संबन्धित है। अब यहाँ ज्याणी गोत्री जाटों के सिर्फ तीन घर आबाद हैं। यहाँ से 20-25 किमी दूर आबाद मंगरी गाँव में ज्याणी रहते हैं।
संत श्री कान्हाराम[11] ने लिखा है कि....ताहड़ देव की प्रथम पत्नी त्योद निवासी ज्याणी गोत्र के जाट करसण जी के पुत्र राव दूल्हन जी सोढ़ी की पुत्री थी। यह सोढ़ी शब्द दूल्हन जी की खाँप या उपगोत्र अथवा नख से संबन्धित है। अब यहाँ ज्याणी गोत्री जाटों के सिर्फ तीन घर आबाद हैं। यहाँ से 20-25 किमी दूर आबाद मंगरी गाँव में ज्याणी रहते हैं।

तेजाजी का प्रथम ननिहाल त्योद
त्योद - यह ग्राम तेजाजी का ननिहाल है। त्योद ग्राम तेजाजी के समाधि धाम सुरसुरा से 5-6 किमी उत्तर दिशा में है। त्योद निवासी ज्याणी गोत्र के जाट करसण जी के पुत्र राव दूल्हन जी सोढ़ी की पुत्री राम कुँवरी का विवाह खरनाल निवासी बोहित जी (बक्साजी) के पुत्र ताहड़ देव (थिर राज) के साथ विक्रम संवत 1104 में हुआ था।

[पृष्ठ-163]: विवाह के समय ताहड़ देव एवं राम कुँवरी दोनों जवान थे। ये सोढ़ी गोत्री जाट पांचाल प्रदेश से आए थे। यह ज्याणी भी सोढियों से निकले हैं। तब सोढ़ी यहाँ के गणपति थे। केंद्रीय सत्ता चौहानों की थी। यहाँ पर तेजाजी का प्राचीन मंदिर ज्याणी गोत्र के जाटों द्वारा बनवाया गया है। अब यहाँ पुराने मंदिर के स्थान पर नए भव्य मंदिर का निर्माण करवाया जा रहा है। यहाँ पर जाट, गुर्जर, बनिया, रेगर, मेघवाल, राजपूत, वैष्णव , ब्राह्मण, हरिजन, जांगिड़ , ढाढ़ी , बागरिया, गोस्वामी, कुम्हार आदि जतियों के लोग निवास करते हैं।
किशनगढ़ तहसील के ग्राम दादिया निवासी लादूराम बड़वा (राव) पहले त्योद आते थे तथा तेजाजी का ननिहाल ज्याणी गोत्र में होने की वार्ता सुनाया करते थे। पहले इस गाँव को ज्याणी गोत्र के जाटों ने बसाया था। अब अधिकांस ज्याणी गोत्र के लोग मँगरी गाँव में चले गए हैं।

[पृष्ठ-164]: तेजाजी के जमाने से काफी पहले ज्यानियों द्वारा बसाया गया था। पुराना गाँव वर्तमान गाँव से उत्तर दिशा में था। इसके अवशेष राख़, मिट्टी आदि अभी भी मिलते हैं। वर्तमान गाँव की छड़ी ज्याणी जाटों की रोपी हुई है।
पाबुबेरा के जाणी
JAGNATH JANI  2 SON
1.भेराराम (पत्नी का गोत्र गोदारा)                                                                                 2.      DEEPARAM OSIAN
                                                                                                                                   1.  KISNA RAM
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हिमताराम(पत्नी का गोत्र साँई)                                                                                              HEERA RAM
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 1.शेराराम (पत्नी का गोत्र ढाका) 2.मगाराम                                                                             NANGARAM
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1.कानाराम 2.मालाराम 3.भींयाराम 4.हरदानराम                                                                       LIKHMARAM
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1.रिड़मल राम 2.वगताराम 3.मोटाराम 4. सताराम                                                                     KHINYA   RAM 
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1.हरखाराम 2.दीपाराम 3.पाबूराम 4.सरूपा राम                                                                          ASU RAM
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1.सवाईराम 2. रामलाल

Jani in Muslim History

H.A. Rose[12] mentions about Jani in a mirasi's chāp or ballad regarding the great deeds of the Chaddrar clan, found along the whole length of the Chenab and Ravi valleys, but far most numerous in Jhang, where they for the most part regard themselves as Rajputs, the Chhadhars claim to be descended from Raja TurTunwar.
Is kul te dātā Nūrā, Gahna, Jāni, Wāchi, Ibrahim Haqqāni. Meaning- Of this family were the generous Nur, Gahna, Jani, Wachu and Ibrahim the Haqqani.

Sir H. M. Elliot Edited by John Dowson[13] writes about two Muslim Jani Rulers in Bengal and Bihar in 13th century: Sultan Sa'id Shamsu-d din sent armies several times from Dehli, and having conquered the province of Behar he stationed his officers there. In 622 (1225 A.D.) he invaded Lakhnauti and Ghiyasu-d din advanced his boats up the stream to oppose him, but peace was made between them. Shamsu-d din accepted thirty eight elephants, and treasure to the amount of eighty lacs. He ordered the Khutba to be read in his name. On his departure he gave Behar to Malik 'Alau-d din Jani. Ghiyasu-d din 'Auz came to Behar from Lakhnauti, and took it, and acted tyrannically. At last in the year 624 (1227 A.D.), Malik Shahid Nasiru-d din Mahmud, son of Sultan Shamsu-d din, having collected an army in Hindustan, and accompanied by 'Izzu-l Malik Jani, marched from Oude to Lakhnauti. At this time Ghiyasu-d din 'Auz had gone on an expedition to Bengal and Kamrup, and had left Lakhnauti stripped of defenders.
Sir H. M. Elliot Edited by John Dowson[14] writes that After great revelling and rejoicing, news arrived in Jumada-l awwal, 626 (April, 1229), of the death of Prince Sa'id Nasiru-d din Mahmud. Balk Malik Khilji had broken out in rebellion in the territories of Lakhnauti, and Sultan Shamsu-d din led thither the armies of Hindustan, and having captured the rebel, he, in a.h. 627, gave the throne of Lakhnauti to Malik 'Alau-d din Jani, and returned to his capital in the month of Rajab of the same year.

Sir H. M. Elliot Edited by John Dowson[15] writes that When Sultan Raziya succeeded to the throne, all things reverted to their old order. But the wazir of the State, Nizamu-l Mulk Junaidi did not give in his adhesion. He, together with Malik Jani, Malik Kochi, Malik Kabir Khan, and Malik 'Izzu-d din Muhammad Salari, assembling from different parts of the country at the gates of Dehli, made war against Sultan Raziya, and hostilities were carried on for a long time. After a while, Mahk Nasiru-d din Tabashi Mu'izzi, who was governor of Oudh, brought up his forces to Dehli to the assistance of Sultan Raziya. When he had crossed the Ganges, the generals, who were fighting against Dehli, met him unexpectedly and took him prisoner. He then fell sick and died.
The stay of the insurgents at the gates of Dehli was protracted. Sultan Raziya, favoured by fortune, went out from the city and ordered her tents to be pitched at a place on the banks of the

[p.334]: Jumna, Several engagements took place between the Turkish nobles who were on the side of the Sultan, and the insurgent chiefs. At last peace was effected, with great adroitness and judicious management. Malik 'Izzu-d din Muhammad Salar and Malik 'Izzu-d din Kabir Khan Ayyaz secretly joined the Sultan and came at night to her majesty's tents, upon the understanding that Malik Jani, Malik Kochi, and Nizamu-l Mulk Junaidi were to be summoned and closely imprisoned, so that the rebellion might subside. When these chiefs were informed of this matter they fled from their camps, and some horsemen of the Sultan pursued them. Malik Kochi and his brother Fakhru-d din were captured, and were afterwards killed in prison. Malik Jani was slain in the neighbourhood of Babul and Nakwan. Nizamu-l Mulk Junaidi went into the mountains of Bardar,1 and died there after a while.

Villages founded by Jyani clan

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