Sunday, September 9, 2018

नशा नाश का द्वार:-वीरमाराम जाणी वरिष्ठ पत्रकार

*दहशत की जद में मालानी.* *::::::गौर कीजिए*

*वीरमाराम जाणी वरिष्ठ पत्रकार की कलम✍✍*

अब भी नहीं चेते, तो बहुत देर हो जाएगी.
क्योंकि अगला नम्बर आप/हम में से किसी का भी हो सकता है.

कभी बेहद शांत माने जाने वाले बाड़मेर जिले के मालाणी इलाके में एक बार फिर खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई गई, वो भी पुलिस की नाक के ठीक नीचे. गुड़ामालानी क्षेत्र में एक ही दिन में तीन-तीन मर्तबा फायरिंग की वारदातों ने स्पष्ट सन्देश दे दिया है कि इलाके की शांति को ग्रहण लग चुका है. आम जनता ख़ौफ़ज़दा है और पुलिस हमेशा की तरह लाचार. साफ है, अब कानून के राज की जगह गैंगस्टर राज ले चुका है. इस 'गैंगस्टर राज' के सबसे प्रमुख किरदार हैं शराब, डोडा-अफीम, स्मैक के तस्कर और इसके नशेड़ी.


यहां सवाल यह कि आखिर हालात ऐसे क्यों बनते जा रहे हैं? बावजूद इसके कि पिछले एक दशक के दरम्यान इस इलाके में खूब आर्थिक उन्नति हुई है. लेकिन हाल की घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि जरूरी नहीं कि पैसा शांति भी लाए. युवाओं में येन केन प्रकारेण पैसे कमाने की दौड़ ने गलत ट्रैक पकड़ लिया है. और यही ट्रैक अब कानून को भी धत्ता बता चुका है.

अब भला इन हालात के लिए जिम्मेदार कौन? पुलिस को दोष दे सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा जिम्मेदार समाज खुद है, यानी हम. ये गैंगस्टर्स कोई दूसरे ग्रह के प्राणी तो हैं नहीं, हमारे आसपास ही पनपते हैं जिन्हें समाज-परिवार पूरा प्रश्रय देता है. इस प्रश्रय की सबसे बड़ी वजह है परिवार में 'इजी मनी' का आगमन और इनका जलवा. आखिर समाज इनके जलवे से क्यों प्रभावित हो जाता है? उत्तर है कि हमारे आदर्श बदल चुके हैं. लंबी-चौड़ी और शीशेबन्द गाड़ियों में सोने की जंजीरें धारण किए गैंगस्टर्स आज हमारे आदर्श हैं. और समाज की इसी स्वीकार्यता का ही नतीजा है कि बड़ी तादाद में गैंगस्टर्स अब हमारे सम्मानीय जनप्रतिनिधि बन चुके हैं. ये अपने अधिपत्य की लड़ाई खुलेआम सड़कों पर लड़ते हुए नजर आते हैं, और हम तमाशबीन. यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया के प्लेटफार्म इन गैंगस्टर्स से कारनामों (गाड़ियों के स्टंट, जेल से काफिले के साथ रिहाई आदि) से भरे पड़े हैं जिन्हें आज की युवा पीढ़ी बड़े चाव से देखती है और प्रेरित भी होती है.

किसी भी गैंगस्टर/अपराधी की शुरुआत छोटे-मोटे अपराध या मामूली तस्करी से ही होती है. उस वक़्त समाज खामोश रहता है क्योंकि सब चाहते हैं कि 'भगत सिंह पैदा हो लेकिन पड़ौस के घर मे पैदा हो'. पुलिस को रत्तीभर भी नहीं पड़ी कि वो पहल (initiative) करे.

इन हालात में एक मामूली तस्कर/अपराधी देखते ही देखते एक गैंगस्टर बन जाता है और नतीजा इस ख़ौफ के रूप में एक दिन हम सबके सामने आता है.

अब फिर सवाल कि भला इस ख़ौफ से मुक्ति कौन दिलाएगा? जवाब है समाज खुद, पुलिस तो कतई नहीं.

पुलिस के हालात किसी से छिपे नहीं हैं. बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी खुद इन तस्करों/अपराधियों के मुखबिर होते हैं. किसी भी छापे/नाकेबंदी की खबर अक्सर इन तस्करों तक पहले ही पहुंच जाती है. कभी-कभार ऊपरी दबाव के चलते पुलिस इन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करती है तो नेता 'आमणो आदमी' बता इन्हें पुलिस के शिकंजे से सम्मान के साथ आजाद करवा देते हैं.

इन अपराधियों में पुलिस का रत्तीभर भी ख़ौफ नहीं होता है. इसके कई सारे कारण हैं. पुलिस और इन अपराधियों के बीच बड़ा याराना पाया जाता है. कॉन्स्टेबल, हैड-कॉन्स्टेबल, थानेदार तो छोड़िए बहुत-से गैंगस्टर्स सीधे 'टाइगर' (जिले का पुलिस मुखिया) से दोस्ती का दम भरते नजर आते हैं. और इस दोस्ती की एकमात्र कड़ी होती है, मोटी हफ्ताबन्दी. मारवाड़ में दशकों से एक कहावत जो प्रचलित है, 'रिपया तेरी तीखी धार, मरग्या मन्शी न थाणदार'. और यही 'तीखी धार' कभी-कभार गिरफ्तारी होने पर कमजोर धारा लगाने में भी मदद करती है, जिसके चलते अपराधी आसानी से कुछ दिनों में छूट भी जाते हैं.

ये तमाम अपराधी/तस्कर/गैंगस्टर/स्मैकिये पुलिस से छिपे नहीं होते हैं. यहां तक कि एक 'बीट कॉन्स्टेबल' के पास भी इन सबकी फेहरिस्त मौजूद होती है लेकिन अधिकतर मामलों में पुलिस कार्रवाई की पहल ही नहीं करती. यहां तक कि किसी की शिकायत पर भी नहीं, उल्टा शिकायतकर्ता का नाम इन अपराधियों  तक पहुंच जाता है और उस बेचारे पर शिकायतकर्ता पर बड़ी आफत. इसी यथास्थितिवाद (status quo) और पुलिस की छवि का नतीजा है कि एक अमन पसंद इंसान पुलिस थानों के आगे से गुजरने से ही परहेज करने लगता है. इन हालात में पुलिस की नाक के नीचे अपराधी/तस्कर/गैंगस्टर/स्मैकिये आसानी से अपना साम्राज्य कायम करते जाते हैं और एक दिन आम आदमी तो छोड़िए, खुद पुलिस को भरे बाजार में गोली चला ये अपनी औकात बता जाते हैं.

इन निराशाजनक हालात में सबसे बड़ी जिम्मेदारी बनती है समाज की, यानि हमारी खुद की. लेकिन हम में से भी कोई पहल नहीं करना चाहता. अक्सर सुनने को मिलता है कि, "दारूड़िया है, उभा मरे". यही नजरअंदाजी दूसरे अपराधियों/तस्कर/गैंगस्टर/स्मैकियों को लेकर नजर आती है. यहां किसी एक शख्स को दोष देना भी उचित नहीं होगा क्योंकि अकेला आदमी कुछ कर भी नहीं सकता. ये  अपराधी/तस्कर/गैंगस्टर/स्मैकिये इतने संगठित और संसाधनों (गाड़ी-घोड़ा, हथियार, नकदी) से लैस होते हैं कि इन्हें एक आम इंसान तो मामूली कीड़ा-मकौड़ा ही नजर आता है. तभी तो कोई भी इनसे भिड़ने की हिम्मत दिखाता है या फिर कोशिश करता है तो धमकियों की बौछार शुरू हो जाती है. पुलिस के हालात पहले ही बयां किये जा चुके हैं. समाज में ज्यादा किसी को पड़ी नहीं जब तक कि खुद के साथ कुछ घटित न हो जाए. नेताओं के लिए वोट इंसान से ज्यादा अहम होता है और अधिकतर गैंगस्टर को नेता 'बाइ नेम' जानते हैं क्योंकि वे 'वोट और नोट' दोनों लाते हैं. इन हालात के बीच लाचार आम आदमी बिना कोई झंझट मोल लिए (धूड़ बाली आंगे लारे) फिर अपने काम-धंधों में लग जाता है, गैंगस्टर्स के जलवों का मूक दर्शक बन. फिर भी कोई आवाज उठाने की हिम्मत करता है तो ये अपराधी कभी हवा में, तो कभी सीने में गोली दाग इन आवाजों को आसानी से खामोश कर देते हैं.

तो क्या आर्थिक समृद्धि और समाज में अधिपत्य की लालसा पाले हम लोग इसी तरह का समाज चाहते हैं? सवाल सीधा युवा पीढ़ी से है क्योंकि हमारी पिछली पीढ़ी ने हमें एक आदर्श समाज सौंपा है जहां बड़े-बुजुर्गों का सम्मान था, पंच-पंचायतों की कद्र थी, पैसे से बड़ी इज्जत थी. हम कैसा समाज अगली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं यह हमें तय करना है. तो क्या वाकई हम एक आदर्श समाज के निर्माण के लिए लड़ाई लड़ना चाहते हैं?

यहां बताना जरूरी कि लड़ाई अकेले आदमी की नहीं है और इस लड़ाई की शुरुआत सबसे पहले परिवार से होनी चाहिए. यदि हमारे खुद के ही परिवार में कोई अपराधी/तस्कर/गैंगस्टर/स्मैकिया है तो हमारे पास रोना रोने, दुनिया को ज्ञान देने का कोई अधिकार नहीं है.

(पिछले दिनों बातचीत में मालूम हुआ कि कभी स्मैक की भयंकर गिरफ्त आ चुके श्रीगंगानगर जिले के मटीली (सादुलशहर) में स्मैकियों/अपराधियों के सामूहिक बहिष्कार के चलते ही एक बड़ी सामाजिक समस्या पर काबू पाया जा सका.)

जिये मालाणी.

(आखिर में एक बात और, इन गैंगस्टर्स की अहमियत, भूमिका, सम्मान और मांग आने वाले दिनों में और बढ़ने वाली है क्योंकि सूबे में आगामी विधानसभा चुनाव के दौरान अफीम-डोडा-शराब (मों मार स्मैक भी) बांटने का जिम्मा इन्ही के हाथ में जो होगा.)
मित्र वीरम जी ज्याणी वरिष्ठ पत्रकार की कलम से।

No comments:

Post a Comment

डाबड़ा कांड के शहीद

#अमर_शहीदों_को_नमन्                                           13मार्च 1947का दिन था।जगह थी नागौर जिले की डीडवाना तहसील में गांव डाबड़ा!एक कि...