Wednesday, May 16, 2018

मृत्युभोज

सबसे बड़े मृत्युभोज का आयोजनकर्ता पट्टीदार!दुख की बात यह है कि ऐसे पट्टीदारों को जाट समाज के पढ़े-लिखे लोग बधाई देकर हौंसला अफजाई कर रहे है।कलंक रीति के कलुशों के मुंह पर कालिख पोतने के बजाय युवा बड़े कारनामे के रूप में प्रस्तुत कर रहे है!
किसी इंसान की मौत के बाद खाने को जुटने वाले लोग इंसान तो कतई नहीं हो सकते!मानते है किसी के घर मे बुजुर्ग की मौत एक सदमा देने वाली घटना है लेकिन अनुभव व इतिहास के सबूत की विदाई के बाद खाने को भटकते लोगों के बारे में क्या कहा जाए!

जिस घर मे मौत हुई है उस घर की महिलाएं रोती-बिलखती है,बेटे हर खाने वाले पर नजर रखते है कि उसके घर मे मौत होगी तो बदला लूंगा,सिर मुंडवाए बच्चे झूठी थालियां लेकर घूम रहे होते है।उनको कुछ पता नहीं कि उसकी दादी या दादा कहाँ है और बाप के साथ समाज के हवाले कौनसा बदला लिया जा रहा है और झूठन ढोने का क्या परिणाम उनको भविष्य में ढोना होगा!लेकिन समाज के लोगों ने अर्थात भूख व नशे के भेड़ियों ने जो कहा है उसको इन बच्चों को वहन करना ही होगा।
मौत पर मातम की मंडी के सौदागर हर जगह मौजूद रहते है।जो लोग अपने माँ-बाप के जीते जी एक गिलास पानी अपने हाथों से नहीं देते वो माँ-बाप की मौत पर घड़ियाली आंसू बहाते है और लौटकर अपनी पूंजी का प्रदर्शन करते हुए पट्टीदार बन जाते है।पट्टी व खेड़ा नालायक बेटों की नुमायन्दगी का नंगा नाच होता है।ऐसे लोग बधाई के नहीं बल्कि मुंह पर कालिख पोतकर प्रभात फेरी के हकदार होते है।
मौत चाहे दादा-दादी की हो या मां-बाप की लेकिन मौत पर पूंजी प्रदर्शन करना भावी वंशजों की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा होती है।जो इंसान अपने पूर्वजों की मौत पर शक्ति-प्रदर्शन करता हो वो इंसान नहीं अपने पूर्वजों की अर्थियों को बेचकर अपना भविष्य तलाशने वाला दलाल होता है।जो इंसान अपने पूर्वजों की मौत पर जश्न मनाता हो,जो इंसान किसी के पूर्वजों की मौत को उत्सव समझकर मिठाइयों का लुत्फ उठाता हो वो इंसान नहीं बल्कि जानवरों से भी गया गुजरा पशुत्व का जीता जागता ताबूत होता है।
पट्टीदार,24,54 खेड़ा का मुख्या सम्मान का हकदार नहीं बल्कि मानवता का कलंक होता है।ऐसे लोगों को आदर देने के बजाय हर जगह हर मोड़ पर एक कलंक समझकर दुत्कारना चाहिए।जो लोग अपनी माँ या बाप की मौत को मातम न समझकर पदवी हासिल करने का उत्सव समझते हो वो कभी भी सभ्य समाज के आदर्श नहीं हो सकते👌
प्रेमाराम सियाग

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