*स्वामी केशवानन्द : एक निराला शिक्षा-संत*
*प्रो. H R ISHRAN की कलम✍✍*
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फ़र्श से अर्श तक पहुंचने वालों के कई किस्से सुने हैं। पर यह किस्सा एक ऐसी शख्सियत का है, जिसे पैर टिकाने के लिए अपना कोई टिकाऊ फ़र्श नसीब नहीं हुआ। आज यहां तो कल वहां। यह किस्सा एक ऐसे यायावर का है जिसने कष्टों के कांटों से जूझते हुए एक विशाल इलाके को शिक्षा से रोशन कर नव-जागरण की ज्वाला प्रज्ज्वलित की और अपने कर्मनिष्ठ जीवन से लोकप्रियता के आकाश पर धूमकेतु की तरह छाया रहा। यह किस्सा बेहद रोमांचक है। ट्विस्ट इसमें कई हैं।
*प्रो. H R ISHRAN की कलम✍✍*
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फ़र्श से अर्श तक पहुंचने वालों के कई किस्से सुने हैं। पर यह किस्सा एक ऐसी शख्सियत का है, जिसे पैर टिकाने के लिए अपना कोई टिकाऊ फ़र्श नसीब नहीं हुआ। आज यहां तो कल वहां। यह किस्सा एक ऐसे यायावर का है जिसने कष्टों के कांटों से जूझते हुए एक विशाल इलाके को शिक्षा से रोशन कर नव-जागरण की ज्वाला प्रज्ज्वलित की और अपने कर्मनिष्ठ जीवन से लोकप्रियता के आकाश पर धूमकेतु की तरह छाया रहा। यह किस्सा बेहद रोमांचक है। ट्विस्ट इसमें कई हैं।
सावित्रीबाई फुले का जिन्होंने सामंतवादी और रूढ़िवादी भारत में वंचित वर्ग की संतति को शिक्षित करने का सपना देखा और उसे साकार करने व उनकी शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करने हेतु स्कूल खोलने का क्रांतिकारी कदम उठाया। फुले दंपति की स्मृति को शत- शत नमन।